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In Focus
  • राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने उनसे भेंट करने आने वाले गणमान्य नागरिकों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से अपील की है की भेंट में पुष्पगुच्छ के स्थान पर उन्हें पुस्तकें भेंट करें
  • टी.बी. से डरें न‍ही, लड़ें। नियमित दवाओं और पोषित आहार का सेवन जहां तन को ठीक करेगा वहीं परिजनों का अपनापन उन्‍हें हौसला देगा। आइयें हम सब मिलकर टी.बी पीडित एक रोगी को गोद ले और उसे नवजीवन दें।

नवीनतम समाचार


नाम श्रीमती आनंदीबेन मफतभाई पटेल
जन्म तारीख 21 नवंबर, 1941
जन्म स्थान खरोद, विजापुर तालुका, जिला मेहसाणा।
स्थायी पता 'धरम', शान बंगलोस के पास, शिलज अहमदाबाद।
वर्तमान पता राजभवन, मध्यप्रदेश भोपाल
शिक्षा एमएससी, एमएड (गोल्ड मेडलिस्ट)।
व्यवसाय सेवानिवृत्त प्राचार्य (मोहिनाबा गर्ल्स हाई स्कूल, अहमदाबाद) एवं समाज-सेवा।
रूचि अध्ययन, लेखन, यात्रा, जनसम्पर्क।
स्कूली शिक्षा के दौरान मेहसाणा जिला के स्कूल स्पोर्टस फेस्टिवल में वर्ष 1958 में 'वीर बाला' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1988 में गुजरात राज्य के 'श्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
वर्ष 1990 में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय स्तर के 'श्रेष्ठ शिक्षक' सम्मान से सम्मानित हुई।
मोहिनाबा कन्या विद्यालय की दो छात्राओं को तैरना नही जानती थी उसके बावजूद नर्मदा नदी में डूबने से बचाने के लिए गुजरात सरकार के 'वीरता पुरस्कार' से नवाजा गया।
वर्ष 1999 में पटेल जागृति मंडल, मुंबई द्वारा 'सरदार पटेल पुरस्कार।
वर्ष 2000 में श्री तपोधन ब्राह्मण विकास मण्डल द्वारा 'विद्या गौरव' पुरस्कार।
वर्ष 2005 में पटेल समुदाय द्वारा 'पाटीदार शिरोमणि' पुरस्कार दिया गया।
अम्बु भाई पुरानी व्यायाम विद्यालय, राजपीपला द्वारा सम्मानित किया गया।
चारुमति योद्धा अवार्ड द्वारा सम्मानित किया गया।
वर्ष 1998 मांडल विधानसभा क्षेत्र जिला अहमदाबाद से चुनकर विधायक बनी। वर्ष 1998 से 2002 शिक्षा (प्रारंभिक, माध्यमिक, वयस्क) एवं महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रही।
पाटन विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2002 से दूसरी बार विधायक बनी और गुजरात में शिक्षा मंत्री लगातार चुनाव जीत नही पाते थे ऐसी मान्याताओं को गलत साबित किया। वर्ष 2002 से 2007 तक शिक्षा (प्रारंभिक, माध्यमिक, वयस्क), उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, महिला एवं बाल कल्याण, खेल, युवा एवं सांस्कृतिक गतिविधि मंत्री के पद पर रहीं।
वर्ष 2007 में पाटन विधानसभा क्षेत्र से तीसरी बार विधायक बनी। वर्ष 2007 से 2012 तक राजस्व, आपदा प्रबंधन, सड़क एवं भवन, राजधानी परियोजना, महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रही।
वर्ष 2012 में अहमदाबाद शहर के घाटलोडिया विधानसभा क्षेत्र से चौथी बार लगातार विधायक बनी तथा राज्य में सबसे अधिक वोटों से जीती। वर्ष 2012 से 2014 तक राजस्व, सूखा राहत, भूमि सुधार, पुनर्वास, पुनर्निर्माण, सड़क एवं भवन, राजधानी परियोजना, शहरी विकास और शहरी आवास मंत्री रही।
22 मई 2014 से 7 अगस्त, 2016 तक गुजरात राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री रही।
चौथी वर्ल्ड वूमेन्स कान्फ्रेंस बीजिंग (चीन) में भारत सरकार के दल में शामिल हुई।
वर्ष 1996 में भारतीय संसदीय दल के साथ बुलगारिया की यात्रा एवं फ्रांस, जर्मनी, हालैण्ड, इंग्लैण्ड, नीदरलैंड, अमेरिका, कनाडा एवं मेक्सिको आदि की शिक्षा अध्ययन यात्राएँ की हैं।
वर्ष 2002 में कॉमन वेल्थ पार्लियामेन्ट्री एसोसिएशन की गुजरात शाखा के दल के साथ नामीबिया - साउथ अफ्रीका में 48वीं कान्फ्रेंस में शामिल हुईं।
सितम्बर 2009 में आपने लंदन में 'विलेज इंडिया' प्रोग्राम में गुजरात का प्रतिनिधित्व किया ।
मई 2015 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी के साथ गुजरात के व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल के साथ बतौर मुख्यमंत्री चीन का प्रवास किया।
गरीब व मध्यम वर्ग के परिवारों को मुफ्त इलाज के लिए मां वात्सल्य‍ योजना लाई।
सभी गरीब वर्गो के विधार्थियों को उच्च शिक्षा हेतु युवा स्वावलंबन योजना बनाई। एवं गुजरात को 100% ODF (खुले में शौच-मुक्त) का अभियान चलाया।
गुजरात को टोल टैक्स (गैर व्यावसायिक वाहनों के लिए) फ्री बनाया।
सभी महिलाओं के लिए कैसर की जांच एवं मुफ्त इलाज प्रारंभ किया।
नर्मदा के पानी को खेत तक पहुंचाने के लिए शाखा नहर, लघु नहर, उपलघु नहर के लिए सर्वसम्मति से जमीन संपादन का सफलता पूर्वक अभियान चलाया।
सबसे कम समय में 100 से ज्यादा नगर नियोजन योजना को मंजूरी दी।
विद्या सहायक योजना का पारदर्शक अमलीकरण। एवं विद्या लक्ष्मी बॉन्ड एवं विद्या दीप योजनाएं लागू की।
माता यशोदा अवार्ड की घोषणा की।
प्रक्रियात्मक सरलीकरण के लिए टेक्नोलॉजी का समुचित उपयोग।
10,000 करोड़ की लागत से ग्राम रास्तों का निर्माण।
राजनै‍ति‍क गतिविधियाँ
  • 1987 में राजनीति से जुड़ी इस दौरान भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष, प्रदेश इकाई की भाजपा उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पद पर रही।
  • 1992 में भाजपा द्वारा आयोजित कन्या कुमारी से श्रीनगर तक की एकता यात्रा में शामिल होने वाली गुजरात की एकमात्र महिला रही। कश्मीर में तिरंगा नही लहरा देने की आतंकवादियों की धमकी के बावजूद 26 जनवरी 1992 में श्रीनगर के लालचौक में राष्ट्रीय ध्वज फहराने में शामिल थी।
साहित्यिक गतिविधियाँ समय-समय पर 'धरती', 'साधना' एवं 'सखी' पत्रिकाओं के लिये लेख लिखती रही।
संस्थाएं सहियर , ग्राम श्री।


The objective of any higher education system should be to make it an instrument both of development and pursuit of the civilisational goals of society. It should be designed for imparting technical and other skills so that the youth is able to participate both in the process of social as well as economic development of the society. These goals' have been spelt out in their statements by the famous educationists through the last few decades, by the Education Commission of India and by the eminent visionaries like our former President Dr. Radhakrishnan.

The Governor is expected to be a person of undoubted ability and position in public life. The Governor is expected to be free from the passions and jealousies of the local party politics and hold the scales impartially between the various factors in the politics of the State. The Governor not only represents the Centre, but as the head of the State, serves his people and faithfully fights their battles with the Centre. He keeps in mind the overall national interests, not partisan party interests. He is supposed to be in tune with the people of the State he represents. The Constitution empowers him to influence the decisions of an elected Government by giving him the right to be consulted, to warn and to encourage. His role is overwhelmingly that of a friend, philosopher and guide to his council of Ministers with unrivalled discretionary powers.


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Pride Of MP

  • मध्यप्रदेश के बहादुर अद्रिका और कार्तिक Adrika and Kartik Story
  • बहादुरी के लिए राष्ट्रपति से सम्मानित

    10 साल की बच्ची अद्रिका और उसके 14 साल के भाई कार्तिक को बहादुरी की कैटेगरी में नेशनल चिल्ड्र्न अवॉर्ड के लिए चुना गया है। पिछले साल 2 अप्रैल को मध्‍यप्रदेश के मुरैना में भारत बंद के दौरान पथराव और फायरिंग के बीच ट्रेन में फंसे मुसाफिरों को खाना पहुंचाने के लिए इन्हें यह अवॉर्ड मिला। राष्‍ट्रपति ने इन दोनों बच्चों को 24 जनवरी को यह अवॉर्ड दिया।

  • अद्रिका और कार्तिक ने बताया

    बीते साल दो अप्रैल की बात है। भारत बंद आंदोलन के चलते स्कूल में छुट्टी थी। हम दोनों टीवी देख रहे थे। टीवी पर देखा कि आंदोलन हिंसक हो गया है। हमारे शहर में फायरिंग और पथराव हो रहा है। उपद्रवियों ने ट्रेनें तक रोक दी हैं। हजारों यात्री छह घंटे से भूखे-प्‍यासे फंसे हुए है। हम दोनों ने तय किया कि ट्रेन में फंसे यात्रियों की मदद करनी चाहिए। पापा घर में नहीं थे। हमने चुपके से खाने-पीने का सामान एक थैले में भरा और पास में स्थित (300 मी. दूर) स्टे‍शन के लिए चल पड़े। घर से निकलते वक्त मां ने टोका.... , पूछा कहां जा रहे हो। इस पर हमने कहा- यहीं हैं। रास्ते में पुलिसवालों ने रोका। हमसे कहा कि घर में रहो, यहां खतरा है। पर हम दोनों किसी तरह बचते-बचते ट्रेन तक जा पहुंचे। ट्रेन में मौजूद लोगों को हमने खाना दिया तो किसी को भरोसा ही नही हुआ। एक महिला ने कहा कि तुम लोग खाना नहीं लाते तो मेरी बच्ची का क्या होता। फिर हम लोग घर लौटे तो दादाजी ने खूब डांट लगाई। जब हमने उन्हें बताया कि हम ट्रेन में फंसे लोगों को खाना पहुंचने गए थे तो वे चुप हो गए और उन्होंने हमें गले लगा लिया। बच्चों के पिता ने बताया कि उन्होंने इस अवॉर्ड के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की वेबसाइट के जरिए ऑनलाइन आवेदन किया था। बाद में दिल्ली से दो अफसरों की टीम मुरैना आई थी और उन्होंने घटना की सत्यता की जांच भी की थी। अद्रिका और कार्तिक ने कहा कि वे दोनों बड़े होकर आईएएस और आईपीएस अधिकारी बनना चाहते हैं।

  • अद्रिका 20 हजार लोगों को आत्मारक्षा की ट्रेनिंग भी दे चुकी हैं-

    अद्रिका ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्‍ट है। वो 20 हजार स्कूली बच्चों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग दे चुकी है। इसलिए उसे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया गया है।

Gandhi Ji

  • गांधी जी आत्‍मकथा Mahatma Gandhi Upvas
    उपवास

    जिन दिनों मैंने दूध और अनाज को छोड़कर फलाहार का प्रयोग शुरू किया, उन्हीं दिनो संयम के हेतु से उपवास भी शुरू किये। मि. केलनबैक इसमें भी मेरे साथ हो गया। पहले मैं उपवास केवल आयोग्य की दृष्टि से करता था। एक मित्र की प्रेरणा से मैंने समझा कि देह दमन के लिए उपवास की आवश्यकता है। चूंकि मैं वैष्णव कुटुम्बे में पैदा हुआ था और चूंकि माताजी कठिन व्रतो का पालन करने वाली थी, इसलिए देश में एकादशी आदि व्रत मैंने किये थे। किन्तु वे देखा- देखी अथवा माता-पिता को प्रसन्न करने के विचार से किये थे। ऐसे व्रतों से कई लाभ होता है, इसे न तो मैं उस समय समझा था, न मानता ही था। किन्तु उस मित्र को उपवास करते देखकर और अपने ब्रहाचर्य व्रत को सहारा पहुंचाने के विचार से मैंने उनका अनुकण करना शुरू किया और एकादशी के दिन उपवास रखने का निश्चय किया। साधारणत: लोग एकादशी के दिन और फल खाकर समझते है कि उन्होंने एकादशी की है। पर फलाहारी उपवास तो अब मैं रोज ही करने लगा था। इसलिए मैंने पानी पानी की छूट रखकर पूरे उपवास शुरू किया। ।

  • उपवास के प्रयोगो के आरम्भिक दिनों में श्रावण का महीना पड़ता था। उस साल रमजान और श्रावण दोनो एकसाथ पड़े थे। गांधी कुटुम्ब ‍में वैष्णव व्रतों के साथ शैव व्रत भी पाले जाते थे। कुटुम्ब के लोग वैष्णव देवालयो की भांति ही शिवालयों में भी जाते थे। श्रावण महीने का प्रदोष- व्रत कुटुम्ब में कोई-न-कोई प्रतिवर्ष करता ही था। इसलिए इस श्रावण मास का व्रत मैंने रखना चाहा।

  • इस महत्वपूर्ण प्रयोग का प्रारम्भ टॉल्सटॉय आश्रम में हुआ था। वहां सत्याग्रही कैदियो के कुटुम्बो की देखरेख करते हुए कैलनबैक और मैं दोनो रहते थे। उनमें बालक और नौजवान भी थे। उनके लिए स्कूहल चलता था। इन नौजवानों में चार-पांच मुसलमान थे। इस्लाम के नियमों का पालन करने में मैं उनकी मदद करता था और उन्हेंक बढ़ावा देता था। नमाज वगैरा की सहूलियत कर देता था। आश्रम में पारसी और ईसाई भी थे। इन सबको अपने-अपने धर्मो के अनुसार चलने के लिए प्रोत्साहित करने का आश्रम में नियम था। अतएव मुसलमान नौजवानो को मैंने रोजे रखने के लिए उत्सााहित किया। मुझे तो प्रदोष-व्रत करना ही था। किन्तु मैंने हिन्दुओ, पारसियों और ईसाईयो को भी मुसलमान नौजवान का साथ देने की सलाह दी। मैंने उन्हें समझाया कि संयम के सब के साथ सहयोग करना स्तुनत्य है। बहुतेरे आश्रमवासियों ने मेरी बात मान ली। हिन्दू और पारसी मुसलमान साथियों को पूरा-पूरा अनुकरण नही करते थे, करना आवश्यक भी न था। मुसलमान सूरज डूबने की राह देखते थे, जब कि दूसरे उससे पहले खा लिया करते थे, जिससे वे मुसलमानो को परोस सके और उनके लिए विशेष वस्तुएं तैयार कर सकें। इसके सिवा, मुसलमान जो सरही (वह हलका भोजन जो रमजान के दिनों में रोजा रखने वाले मुसलमान कुछ रात रहते कर लेते है) खाते थे, उसमें दूसरो के सम्मिलित होने की आवश्यरकता न थी। और मुसलमान दिन में पानी भी न पीते थे, जबकि दूसरे लोग छूट से पानी पीते थे।

  • इस प्रयोग का एक परिणाम यह हुआ कि उपवास और एकाशन का महत्व सब समझने लगे। एक-दूसरे के प्रति उदारता और प्रेमभाव में वृद्धि हुई। आश्रम में अन्नाहार का नियम था। यह नियम मेरी भावना के कारण स्वीकार किया गया था,यह बात मुझे यहां आभारपूर्वक स्वीकार करनी चाहिए। रोजे के दिनों में मुसलमानो को मांस का त्याग कठिन प्रतीत हुआ, पर नवयुवको में से किसी ने मुझे उसका पता नही चलने दिया। वे आनन्द और रस-पूर्वक अन्नाहर करते थे। हिन्दू बालक आश्रम में अशोभनीय न लगने वाले स्‍वादिष्‍ठ भोजन भी उनके लिए तैयार करते थे।

  • अपने उपवास का वर्णन करते हुए यह विषयान्तर मैंने जान-बूझकर किया है, क्योंकि इस मधुर प्रसंग का वर्णन मैं दूसरी जगह नही कर सकता था। और, इस विषयान्तर के साथ मैंने अपनी एक आदत की भी चर्चा कर ली है। अपने विचार में मैं जो अच्छा काम करता हूं, उसमें अपने साथ रहनेवालो को सम्मिलित करने का प्रयत्न मैं हमेशा करता हूं। उपवास और एकाशन के प्रयोग नये थे, पर प्रदोष और रमजाना के बहाने मैंने सबको इसमें फॉद लिया।

  • इस प्रकार सहज ही आश्रम में संयम का वातावरण बढ़ा। दूसरे उपवासो और एकाशनो में भी आश्रमवासी सम्मिलित होने लगे। और,मैं मानता हूं कि इसका परिणाम शुभ निकला। सबके हृदयो पर संयम को कितना प्रभाव पड़ा, सबके विषयों को संयत करने में उपवास आदि ने कितना हाथ बटांया, यह मैं निश्चय पूर्वक न ही कह सकता। पर मेरा अनुभव यह है कि उपवास आदि से मुझ पर तो आरोग्य और विषय-नियमन की दृष्टि से बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। फिर भी मैं यह जानता हूं कि उपवास आदि से सब पर इस तरह का प्रभाव पड़ेगा ही, ऐसा कोई अनिवार्य नियम नही है। इन्द्रय दमन के हेतु से किये गये उपवास से ही विषयों को संयम करने का परिणाम निकल सकता है। कुछ मित्रो का यह अनुभव भी है कि उपवास की समाप्ति पर विषयेच्छा और स्वाद तीव्र हो जाते है। मतलब यह कि उपवास के दिनों में विषय को संयत करने और स्वाद को जीतने की सतत भावनी बनी रहने पर ही उसका शुभ परिणाम निकल सकता है। यह मानना निरा भ्रम है कि बिना किसी हेतु के और बेमन किये जानेवाले शारीरिक उपवास का स्वतंत्र परिणाम विषय-वासना को संयत करने में आयेगा। गीताजी के दूसरे अध्याय का यह श्लोक यहां बहुत विचारणीय है:


    विषया विनिर्वते निराहारस्यआ देहिन:।
    रसवर्जं रसोडप्पास्यय पर दृष्ट्वा निवर्तत।।

  • ( उपवासी के विषय उपवास के दिनो के शान्त होते है, पर उसका रस नही जाता। रस तो ईश्वर-दर्शन से ही ईश्वर प्रसाद से ही शान्त होता है) तात्पर्य यह है कि संयमी के मार्ग में उपवास आदि एक साधन के रूप में है, किन्तु ये ही सब कुछ नही है। और यदि शरीर के उपवास के साथ मन का उपवास न हो तो उसकी परिणति दंभ में होती है और वह हानिकारक सिद्ध होता है।

Pride of India

  • सृष्टि देशमुख की सफलता की कहानी Srishti Deshmukh Success Story

    भोपाल की सृष्टि देशमुख ने ऑल इंडिया में पांचवी रैंक हासिल की है।

  • भोपाल – संघ लोक सेवा आयोग ने शुक्रवार को सिविल सेवा परीक्षा 2018 का मुख्य परीक्षा परिणाम जारी कर दिया। इस परीक्षा में भोपाल की सृष्टि देशमुख ने ऑल इंडिया में पांचवी रैंक लेकर महिलाओं में अव्वल स्थान हासिल किया है। सृष्टि ने 2018 में केमिकल इंजीनियरिंग पूरी की और अब पहले ही प्रयास में इस परीक्षा को पास किया है।

  • सृष्टि देशमुख की सफलता की कहानी, उन्हीं की जुबानी - मेरे दिमाग में आईएएस बनने की धुन इस कदर हावी थी कि मैंने कॉलेज के दौरान कैंपस प्लेसमेंट में हिस्सा नहीं लिया, न सीवी तैयार किया। किसी कंपनी को एप्रोच नहीं किया, क्योंकि मन में ठान रखा था कि प्लेसमेंट नहीं चाहिए। मैं तैयारी करती चली गई और सफल हुई। जब आप तैयारी शुरू करते हैं तो कई आंकड़े आपके सामने आते हैं। मैंने टेस्ट सीरीज में पढ़ा था कि मप्र में 15 से 30 हजार स्कूल ऐसे हैं जहां सभी बच्चों के लिए सिर्फ एक टीचर है। यह बात मेरे दिमाग में घर कर गई। मैंने सोचा... मैं इस स्थिति को बदलने के लिए क्या कर सकती हूं। यहीं से मोटिवेशन मिला। इंजीनियरिंग चुना ताकि बैकअप तैयार रहे।

  • भोपाल में रहकर किया टॉप : ज्यादातर लोग सिविल सर्विसेस की तैयारी के लिए दिल्ली का रुख करते हैं। मैंने सोचा जब कॉलेज भोपाल से किया तो तैयारी भी यहीं से करूंगी। इस दौरान कभी स्टडी मटेरियल नहीं मिला तो कहीं कोचिंग क्लास नहीं मिली। मुझे इंटरनेट ने मदद की। नॉलेज, टेस्ट सीरिज, क्लासेस सबकुछ इंटरनेट पर है।

  • मप्र कैडर लूंगी : मैंने मप्र कैडर का प्रिफरेंस भरा था। जो रैंक आई है उससे मप्र कैडर में ही आईएएस अफसर बन जाऊंगी।

  • दोधारी तलवार है इंटरनेट : इंटरनेट दोधारी तलवार है। मैंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स से खुद को दूर रखा। व्हॉट्सएप, फेसबुक-टि्वटर बंद कर दिया। फ्रेंड्स से नहीं मिलती थी, पार्टी में नहीं जाती थी। दोस्त ताने भी मारते थे कि मैं सोशली कट रही हूं, लेकिन मन में लगता था - आज पढ़ लूंगी तो शायद कुछ अच्छा कर पाऊं।

  • तैयारी का तरीका : परीक्षा के लिए बहुत सब्जेक्ट होते हैं, अलग-अलग किताबें पढ़नी होती हैं। लेकिन मैंने हमेशा यूपीएससी सिलेबस में दिए विषयों के आधार पर तैयारी की। पिछले वर्षों के प्रश्न पत्र पढ़ती रही, ताकि पता चले कि किस तरह के सवाल पूछे जाते हैं। इन सबसे समय पर जवाब लिखने का अच्छा अभ्यास भी हुआ। इस परीक्षा में केमिस्ट्री होती है, केमिकल इंजीनियरिंग नहीं, इसलिए मैंने सोश्योलॉजी को एक विषय के तौर पर चुना।