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In Focus
  • राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने उनसे भेंट करने आने वाले गणमान्य नागरिकों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से अपील की है की भेंट में पुष्पगुच्छ के स्थान पर उन्हें पुस्तकें भेंट करें
  • टी.बी. से डरें न‍ही, लड़ें। टी.बी. अब असाध्‍य नही। नियमित दवाओं और पोषित आहार का सेवन जहां तन को ठीक करेगा वहीं परिजनों का अपनापन उन्‍हें हौसला देगा। आइयें हम सब मिलकर टी.बी पीडित एक रोगी को गोद ले और उसे नवजीवन दें।

नवीनतम समाचार


नाम श्रीमती आनंदीबेन मफतभाई पटेल
जन्म तारीख 21 नवंबर, 1941
जन्म स्थान खरोद, विजापुर तालुका, जिला मेहसाणा।
स्थायी पता 'धरम', शान बंगलोस के पास, शिलज अहमदाबाद।
वर्तमान पता राजभवन, मध्यप्रदेश भोपाल
शिक्षा एमएससी, एमएड (गोल्ड मेडलिस्ट)।
व्यवसाय सेवानिवृत्त प्राचार्य (मोहिनाबा गर्ल्स हाई स्कूल, अहमदाबाद) एवं समाज-सेवा।
रूचि अध्ययन, लेखन, यात्रा, जनसम्पर्क।
  • स्कूली शिक्षा के दौरान मेहसाणा जिला के स्कूल स्पोर्टस फेस्टिवल में वर्ष 1988 में 'वीर बाला' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • वर्ष 1988 में गुजरात राज्य के 'श्रेष्ठ शिक्षक' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • वर्ष 1990 राष्ट्रीय स्तर के 'श्रेष्ठ शिक्षक' सम्मान से सम्मानित हुई।
  • मोहिनाबा कन्या विद्यालय की दो छात्राओं को तैरना नही जानती थी उसके बावजूद नर्मदा नदी में डूबने से बचाने के लिए गुजरात सरकार के 'वीरता पुरस्कार' से नवाजा गया।
  • वर्ष 1999 में पटेल जागृति मंडल, मुंबई द्वारा 'सरदार पटेल पुरस्कार।
  • वर्ष 2000 में श्री तपोधन ब्राह्मण विकास मण्डल द्वारा 'विद्या गौरव' पुरस्कार।
  • वर्ष 2005 में पटेल समुदाय द्वारा 'पाटीदार शिरोमणि' पुरस्कार दिया गया।
  • अम्बु भाई पुरानी व्यायाम विद्यालय, राजपीपला द्वारा भी सम्मानित किया गया।
  • राज्य सभा सदस्य, वर्ष 1994-1998।
  • वर्ष 1998 मांडल विधानसभा क्षेत्र जिला अहमदाबाद से चुनकर विधायक बनी। वर्ष 1998 से 2002 शिक्षा (प्रारंभिक, माध्यमिक, वयस्क) एवं महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रही।
  • पाटन विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 2002 से दूसरी बार विधायक बनी और गुजरात में शिक्षा मंत्री लगातार चुनाव जीत नही पाते थे ऐसी मान्याताओं को गलत साबित किया। वर्ष 2002 से 2007 तक शिक्षा (प्रारंभिक, माध्यमिक, वयस्क), उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, महिला एवं बाल कल्याण, खेल, युवा एवं सांस्कृतिक गतिविधि मंत्री के पद पर रहीं।
  • वर्ष 2007 में पाटन विधानसभा क्षेत्र से तीसरी बार विधायक बनी। वर्ष 2007 से 2012 तक राजस्व, आपदा प्रबंधन, सड़क एवं भवन, राजधानी परियोजना, महिला एवं बाल कल्याण मंत्री रही।
  • वर्ष 2012 में अहमदाबाद शहर के घाटलोडिया विधानसभा क्षेत्र से चौथी बार लगातार विधायक बनी तथा राज्य में सबसे अधिक वोटों से जीती। वर्ष 2012 से 2014 तक राजस्व, सूखा राहत, भूमि सुधार, पुनर्वास, पुनर्निर्माण, सड़क एवं भवन, राजधानी परियोजना, शहरी विकास और शहरी आवास मंत्री रही।
  • 22 मई 2014 से 7 अगस्त, 2016 तक गुजरात राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री रही।
  • चौथी वर्ल्ड वूमेन्स कान्फ्रेंस बीजिंग (चीन) में भारत सरकार के दल में शामिल हुई।
  • वर्ष 1996 में भारतीय संसदीय दल के साथ बुलगारिया की यात्रा एवं फ्रांस, जर्मनी, हालैण्ड, इंग्लैण्ड, नीदरलैंड, अमेरिका, कनाडा एवं मेक्सिको आदि की शिक्षा अध्ययन यात्राएँ की हैं।
  • वर्ष 2002 में कॉमन वेल्थ पार्लियामेन्ट्री एसोसिएशन की गुजरात शाखा के दल के साथ नामीबिया - साउथ अफ्रीका में 48वीं कान्फ्रेंस में शामिल हुईं।
  • सितम्बर 2009 में आपने लंदन में 'विलेज इंडिया' प्रोग्राम में गुजरात का प्रतिनिधित्व किया ।
  • मई 2015 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी के साथ गुजरात के व्यापारिक प्रतिनिधि मंडल के साथ बतौर मुख्यमंत्री चीन का प्रवास किया।
  • गरीब व मध्यम वर्ग के परिवारों को मुफ्त इलाज के लिए मां वात्सल्य‍ योजना लाई।
  • सभी गरीब वर्गो के विधार्थियों को उच्च शिक्षा हेतु युवा स्वावलंबन योजना बनाई।
  • गुजरात को 100% ODF (खुले में शौच-मुक्त) का अभियान चलाया।
  • गुजरात को टोल टैक्स (गैर व्यावसायिक वाहनों के लिए) फ्री बनाया।
  • सभी महिलाओं के लिए कैसर की जांच एवं मुफ्त इलाज प्रारंभ किया।
  • नर्मदा के पानी को खेत तक पहुंचाने के लिए शाखा नहर, लघु नहर, उपलघु नहर के लिए सर्वसम्मति से जमीन संपादन का सफलता पूर्वक अभियान चलाया।
  • सबसे कम समय में 100 से ज्यादा नगर नियोजन योजना को मंजूरी दी।
राजनै‍ति‍क गतिविधियाँ
  • 1987 में राजनीति से जुड़ी इस दौरान भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष, प्रदेश इकाई की भाजपा उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पद पर रही।
  • 1992 में भाजपा द्वारा आयोजित कन्या कुमारी से श्रीनगर तक की एकता यात्रा में शामिल होने वाली गुजरात की एकमात्र महिला रही। कश्मीर में तिरंगा नही लहरा देने की आतंकवादियों की धमकी के बावजूद 26 जनवरी 1992 में श्रीनगर के लालचौक में राष्ट्रीय ध्वज फहराने में शामिल थी।
साहित्यिक गतिविधियाँ समय-समय पर 'धरती', 'साधना' एवं 'सखी' पत्रिकाओं के लिये लेख लिखती रही।

The objective of any higher education system should be to make it an instrument both of development and pursuit of the civilisational goals of society. It should be designed for imparting technical and other skills so that the youth is able to participate both in the process of social as well as economic development of the society. These goals' have been spelt out in their statements by the famous educationists through the last few decades, by the Education Commission of India and by the eminent visionaries like our former President Dr. Radhakrishnan.

The Governor is expected to be a person of undoubted ability and position in public life. The Governor is expected to be free from the passions and jealousies of the local party politics and hold the scales impartially between the various factors in the politics of the State. The Governor not only represents the Centre, but as the head of the State, serves his people and faithfully fights their battles with the Centre. He keeps in mind the overall national interests, not partisan party interests. He is supposed to be in tune with the people of the State he represents. The Constitution empowers him to influence the decisions of an elected Government by giving him the right to be consulted, to warn and to encourage. His role is overwhelmingly that of a friend, philosopher and guide to his council of Ministers with unrivalled discretionary powers.

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Pride Of MP

  • मशहूर शायर व गीतकार बशीर बद्र

    ‘’उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये’’ जैसी शायरी के लिये 15 फरवरी 1935 को जन्‍में श्री बशीर बद्र को वर्ष 1999 में उर्दू शायरी के लिये ‘पद्मश्री’ मिला। उनकी चर्चित किताबें है बशीरबद्र, आस, कल्‍चर यकंशा और बशीर समग्र।

  • नामचीन लेखक मंजूर एहतेशाम

    3 अप्रैल 1948 में भोपाल में जन्‍में भोपाल में मंजूर एहतेशाम यूं तो शिल्‍पकार हाउस के मालिक है और फर्नीचर का व्‍यवसाय करते है, पर उनके अंदर बसे साहित्‍कार ने सूखा बरगद, कुछ दिन, दास्‍तान–ए- लापता, बशारत मंजिल जैसे उपन्‍यास कर सृजन किया और उन्‍हें सहित्‍य के क्षेत्र में वर्ष 2003 में ‘पद्मश्री’ सम्‍मान प्राप्‍त हुआ।

  • लेखिका मेहरून्निसा परवेज

    म.प्र. के बालाघाट में वर्ष 1944 में जन्‍मी मेहरून्निसा परवेज जी ने परसंग, लाल गुलाब, अयोध्‍या से वापसी और कोरजा उपन्‍यास और कहानियों से साहित्‍य जगत में विशिष्‍ट पहचान बनाई है और वर्ष 2005 में भारत सरकार ने उन्‍हें ‘पद्मश्री’ सम्‍मानित किया है।

  • शास्‍त्रीय गायक गु्ंदेचा ब्रदर्स

    उज्‍जैन में जन्‍में रमाकांत और उमाकांत गुंदेचा बंधुओं ने ध्रुपद जैसी कठिन गायन विधा में दक्षता हासिल की और ध्रुपद को नई ऊंचाइयां प्रदान की। इन्‍होंने स्‍वंय के प्रयासों से भोपाल में गुरूकुल की स्‍थापना की जिसमें देशी- विदेशी शिष्‍य ध्रुपद की शिक्षा प्राप्‍त कर रहे है। वर्ष 2012 में गुंदेचा ब्रदर्स को ‘पद्मश्री’ से सम्‍मानित किया गया।

  • कर्मयोगी पत्रकार विजयदत्‍त श्रीधर

    श्री विजयदत्‍त श्रीधर के अथक प्रयासों से भोपाल में माधवराव सप्रे स्‍मृति समाचार पत्र संग्रहालय स्‍थापित हुआ है। यह संग्रहालय पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले शोधार्थियों के लिये महत्‍वपूर्ण संस्‍थान है। श्रीधर जी को वर्ष 2012 में पत्रकारिता के क्षेत्र में विशिष्‍ट योगदान के लिये भारत सरकार का ‘पद्मश्री’ प्राप्‍त हुआ है।

  • प्रसिद्ध ज्ञान चतुर्वेदी

    साहित्यिक विधा यग्‍ंय के जाने माने रचनाकर और हृदय रोग विशेषज्ञ ज्ञान चतुर्वेदी का जन्‍म 2 अगस्‍त 1952 को हुआ। बारामासी, मरीचिका, अलग, खामोश नंगे, नरकयात्रा, हम न मरब में लिखे गये उनके व्यग्‍ंय सार्वकालिक प्रासंगिक है। वर्ष 2015 में ज्ञान जी अपनी अद्भुत व्‍यंग्‍य रचना शैली के कारण ‘पद्मश्री’ से सम्‍मानित हुए।

  • उपन्‍यासकार रमेश चंद्र शाह

    शासकीय हमीदिया विद्यालय में हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष रहे रमेश चंद्र शाह ने निरंतर साहित्‍य सृजन से हिन्‍दी साहित्‍य को समृद्ध किया है। उपन्‍यास, नाटक और निबंध जैसे विषयों पर गंभीर लेखन के कारण वर्ष 2014 में शाह को ‘पद्मश्री’ से सम्‍मानित किया गया।

Gandhi Ji

  • चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह

    गांधी की पहली बड़ी उपलब्धि १९१८ में चम्पारन सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह में मिली हालांकि अपने निर्वाह के लिए जरूरी खाद्य फसलों की बजाए नील (indigo) नकद पैसा देने वाली खाद्य फसलों की खेती वाले आंदोलन भी महत्वपूर्ण रहे। जमींदारों (अधिकांश अंग्रेज) की ताकत से दमन हुए भारतीयों को नाममात्र भरपाई भत्ता दिया गया जिससे वे अत्यधिक गरीबी से घिर गए। गांवों को बुरी तरह गंदा और अस्वास्थ्यकर (unhygienic); और शराब, अस्पृश्यता और पर्दा से बांध दिया गया। अब एक विनाशकारी अकाल के कारण शाही कोष की भरपाई के लिए अंग्रेजों ने दमनकारी कर लगा दिए जिनका बोझ दिन प्रतिदिन बढता ही गया। यह स्थिति निराशजनक थी। खेड़ा (Kheda), गुजरात में भी यही समस्या थी। गांधी जी ने वहां एक आश्रम (ashram) बनाया जहाँ उनके बहुत सारे समर्थकों और नए स्वेच्छिक कार्यकर्ताओं को संगठित किया गया। उन्होंने गांवों का एक विस्तृत अध्ययन और सर्वेक्षण किया जिसमें प्राणियों पर हुए अत्याचार के भयानक कांडों का लेखाजोखा रखा गया और इसमें लोगों की अनुत्पादकीय सामान्य अवस्था को भी शामिल किया गया था। ग्रामीणों में विश्‍वास पैदा करते हुए उन्होंने अपना कार्य गांवों की सफाई करने से आरंभ किया जिसके अंतर्गत स्कूल और अस्पताल बनाए गए और उपरोक्त वर्णित बहुत सी सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने के लिए ग्रामीण नेतृत्व प्रेरित किया।

  • लेकिन इसके प्रमुख प्रभाव उस समय देखने को मिले जब उन्हें अशांति फैलाने के लिए पुलिस ने गिरफ्तार किया और उन्हें प्रांत छोड़ने के लिए आदेश दिया गया। हजारों की तादाद में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए ओर जेल, पुलिस स्टेशन एवं अदालतों के बाहर रैलियां निकालकर गांधी जी को बिना शर्त रिहा करने की मांग की। गांधी जी ने जमींदारों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन और हड़तालों को का नेतृत्व किया जिन्होंने अंग्रेजी सरकार के मार्गदर्शन में उस क्षेत्र के गरीब किसानों को अधिक क्षतिपूर्ति मंजूर करने तथा खेती पर नियंत्रण, राजस्व में बढोतरी को रद्द करना तथा इसे संग्रहित करने वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस संघर्ष के दौरान ही, गांधी जी को जनता ने बापू पिता और महात्मा (महान आत्मा) के नाम से संबोधित किया। खेड़ा में सरदार पटेल ने अंग्रेजों के साथ विचार विमर्श के लिए किसानों का नेतृत्व किया जिसमें अंग्रेजों ने राजस्व संग्रहण से मुक्ति देकर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप, गांधी की ख्याति देश भर में फैल गई।

Tiranga

  • तिरंगे की कहानी

    प्रत्‍येक देश के नागरिकों की एक राष्‍ट्रीय चेतना होती है जिसकी झलक उनके आदर्शो, उद्देश्‍यों और कार्य पद्धति में देखी जा सकती है। इसी राष्‍ट्रीय चेतना की अभिव्‍यक्ति का एक माध्‍यम है। हमारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज। हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज का एक समृद्ध इतिहास रहा है। आज हम जिस राष्‍ट्रीय ध्‍वज को देखते हैं वह एक लंबी प्रक्रिया के बाद यहां तक पहुंचा है। सन् 1905 में लार्ड कर्जन द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा के समय भारत में राष्‍ट्रीय ध्‍वज की प्रथम अवधारणा ने जन्‍म लिया। भारत का प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त, 1906 को कोलकाता के पारसी बागान स्‍क्‍वायर में फहराया गया। इस ध्‍वज में लाल, पीले और हरे रंग की तीन समानांतर पट्टियां थी। इस ध्‍वज के ऊपरी लाल भाग में आठ सफेद कमल के फूल छपे थे। निचले हरे हिस्‍से में बाई ओर सफेद रंग का एक सूर्य और दाई ओर एक अर्धचन्‍द्र और तारा था। बीच के पीले भाग में देवनागरी में वन्‍देमातरम् लिखा था। भारत का दूसरा राष्‍ट्रीय ध्‍वज पेरिस में 1907 में मैडम कामा और कुछ अन्‍य निष्‍कासित क्रांतिकारियों ने फहराया। यह ध्‍वज उस समय भारत में प्र‍चलित ध्‍वज जैसा नहीं था। इसके ऊपरी भाग में एक कमल और सप्‍तर्षि तारामंडल का प्रतिनिधित्‍व करने वाले सात तारे कढ़े थे।

  • 1920 में राष्‍ट्रीय ध्‍वज को एक नया रूप मिला। 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में महात्‍मा गांधी ने असहयोग आन्‍दोलन शुरू करने का प्रस्‍ताव पारित किया। इसी दौरान उन्‍होंने नए राष्‍ट्रीय ध्‍वज की संकल्‍पना भी प्रदान की। गांधी जी द्वारा अभिकल्पित इस राष्‍ट्रीय ध्‍वज में भी तीन रंग थे। सबसे ऊपर सफेद रंग था जो कि अल्‍पसंख्‍यकों और अन्‍य संप्रदायों का प्रतीक था। बीच का हरा रंग इस्‍लाम के अनुयायियों का प्रतीक था ज‍बकि सबसे नीचे स्थित लाल रंग हिन्‍दू धर्म को मानने वालों का प्रतीक था खादी से बने इस राष्‍ट्रीय ध्‍वज के बीच में चरखा भी बनाया गया था। इस ध्‍वज का डिजाइन इस तथ्‍य से प्रेरित था कि राष्‍ट्र के सम्‍मुख सभी धर्म समान है। यही कारण है कि ध्‍वज में सभी धर्मों का प्रतिनिधित्‍व करने वाले रंगों को समान स्‍थान प्रदान किया गया था। हालांकि आमतौर पर इस ध्‍वज को पूरे देश में स्‍वीकार किया गया परन्‍तु कुछ स्‍थानों पर इसकी कड़ी आलोचना हुई। आलोचकों के अनुसार राष्‍ट्रीय ध्‍वज में संप्रदाय विशेष के प्रतीक होना उचित नहीं। हमारे तिरंगे की विकास यात्रा में अगला पड़ाव 1931 में कराची में आयोजित भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन था। इसी अधिवेशन में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का स्‍वरूप बदलने का निर्णय लिया गया। यहां यह निर्णय लिया गया कि राष्‍ट्रीय ध्‍वज तिरंगा ही रहेगा। उसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफेद और सबसे नीचे हरा रंग रहेगा। इन तीनों रंगो की पट्टियां एक-दूसरे के समानांतर रहेंगी। सफेद भाग में नीले रंग का चक्र भी होगा। साथ ही इसमें बीच के सफेद भाग में जनता की आशाओं तथा आकांक्षाओं का प्रतीक चरखा भी अंकित होगा। आगे चलकर यही ध्‍वज राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में स्‍वीकृत हुआ। स्‍वतंत्रता प्राप्ति तक इसका यही स्‍वरूप बना रहा।

  • 15 अगस्‍त, 1947 को हमारे देश ने अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाई। इसके बाद राष्‍ट्रीय ध्‍वज में कुछ परिवर्तन किए गए जिनके फलस्‍वरूप हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज ने वर्तमान स्‍वरूप ग्रहण किया। स्‍वतंत्र भारत में राष्‍ट्रीय ध्‍वज तिरंगे में भी तीन रंगों की समानांतर पट्टियां हैं। सबसे ऊपर साहस और शौर्य का प्रतीक केसरिया बीच में शांति और सत्‍य का प्रतीक सफेद तथा सबसे नीचे आशा, खुशी, हरियाली तथा समृद्धि का प्रतीक हरा रंग है। बीच की सफेद रंग की पट्टी में नीले रंग का चक्र भी बना हुआ है। 24 तीलियों वाले इस चक्र को ‘अशोक चक्र’ कहते है। यह चक्र सारनाथ में मौर्य सम्राट अशोक द्वारा निर्मित अशोक स्‍तंभ से लिया गया है। चक्र का व्‍यास ध्‍वज की सफेद पट्टी के बराबर होता है। वास्‍तव में यह चक्र गौतम बुद्ध द्वारा कल्पित धम्‍म चक्‍क (धर्म चक्र) ही है। इसका प्रवर्तन सबसे पहले सारनाथ में किया गया। पाली भाषा में धम्‍म चक्‍क का अर्थ ‘ न्‍याय का राज्‍य’ है अर्थात् बलपूर्वक शासन के स्‍थान पर न्‍याय और नीति द्वारा शासन की व्‍यवस्‍था करना। भारतीय संस्‍कृति के प्रतीक इस चक्र को बौद्ध भक्‍त सम्राट अशोक ने पत्‍थरों पर खुदाई करके सारनाथ स्‍तंभ में प्रतिष्ठित किया।

  • हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज का डिजाइन एक स्‍वतंत्रता सेनानी पिंगली वैंकया ने बनाया है। ध्‍वज की लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 है।

  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज प्रत्‍येक राष्‍ट्र के सम्‍मान का प्रतीक होता है। सभी देशवासियों का यह कर्तव्‍य है कि वे अपने राष्‍ट्रीय ध्‍वज का उचित सम्‍मान करें। राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रति सम्‍मान और निष्‍ठा की भावना महत्‍वपूर्ण है। राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराने के संबंध में सरकार द्वारा समय-समय पर जारी अनुदेशों के अतिरिक्‍त विभिन्‍न अधिनियम भी लागू होते हैं। राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराने के संबंध में फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002 में इन सभी कानूनों, मान्‍यताओं, अनुदेशों और दिशा- निर्देशों को शामिल किया गया है। इसे तीन भागों में बांटा गया है। पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण दिया गया है। दूसरे भाग में आम लोगों, निजी संस्‍थाओं तथा शिक्षण संस्‍थाओं द्वारा ध्‍वज फहराने संबंधी नियमों का उल्‍लेख है तथा तीसरे भाग में केन्‍द्र एवं राज्‍य सरकार और उनके संगठनों एवं एजेंसियों द्वारा ध्‍वज फहराने संबंधी नियम दिए गए हैं। तदुपरांत राष्‍ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2005 के माध्‍यम से वर्ष 1971 के अधिनियम में संशोधन किए गए तथा आम जनता को सम्‍मान तिरंगे का प्रयोग करने की अनुमति दी गई।

  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रयोग एवं उसे फहराने के संबंध में अनेक नियम हैं जैसे राष्‍ट्रीय ध्‍वज का व्‍यावसायिक प्रयोग तथा कपड़े की तरह प्रयोग वर्जित है। रूमाल आदि पर इसकी कढ़ाई अथवा छपाई भी वर्जित है। राष्‍ट्रीय ध्‍वज पर कुछ भी लिखा नहीं जाना चाहिए। किसी भी व्‍यक्ति, वस्‍तु अथवा इमारत को ढकने के लिए भी राष्‍ट्रीय ध्‍वज का प्रयोग नहीं किया जाए। राष्‍ट्रीय शोक के अवसरों को छोड़कर राष्‍ट्रीय ध्‍वज कभी भी आधा झुका न हो। राष्‍ट्रीय ध्‍वज को फहराते समय सदैव उसके सम्‍मान और गरिमा का ख्‍याल रखा जाए। सभा में फहराए जाने पर ध्‍वज वक्‍ता के पीछे उसके सिर से कुछ ऊपर फहराया जाए। ध्‍वज को फहराते समय केसरिया रंग की पट्टी सदैव ऊपर की ओर हो। क्षतिग्रस्‍त अथवा अस्‍त-व्‍यस्‍त ध्‍वज कभी नहीं फहराया जाएं। कोई अन्‍य ध्‍वज राष्‍ट्रीय ध्‍वज से ऊपर अथवा बराबरी में नहीं फहराया जाए। साथ ही अन्‍य देशों के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के साथ फहराते समय इसे सबसे दाई ओर फहराया जाए तथा फ्लैग मास्‍ट के ऊपर फूल, मालाएं अथवा कोई अन्‍य वस्‍तु न रखें। यदि खुले स्‍थान में ध्‍वज फहराया जा रहा हो तो जहां तक संभव हो किसी भी प्रकार के मौसम में सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाए। राष्‍ट्रीय ध्‍वज का प्रयोग कभी भी सजावट की वस्‍तु के रूप में न किया जाए। महत्‍वपूर्ण राष्‍ट्रीय अथवा सांस्‍कृतिक अवसरों तथा खेल प्रतियोगिताओं में कागज के बने ध्‍वज का प्रयोग किया जा सकता है। राष्‍ट्रीय ध्‍वज को कभी भी ऐसी अवस्‍था में न फहराया जाए जिससे उसे नुकसान पहुंचने की आंशका हो।

  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज हमारे देश को एक अलग पहचान देने के साथ-साथ हमें अपनी स्‍वाधीनता का बोध भी कराता है। हमारा यह कर्तव्‍य है कि हम पूरी निष्‍ठा के साथ अपने राष्‍ट्रीय ध्‍वज का गौरव और सम्‍मान बनाए रखें।